सत्तुआइन के साथ आज से शुरू हुआ मिथिला का पावन पर्व जुड़-शीतल।

आज मिथिला में जुड़-शीतल पर्व की शुरुआत हो चुकी है। जहां पहले दिन सतुआनी मनाया जा रहा है। जिसमें सत्तु और आम के टिकोले से पूजा की जाती है। जिससे शरीर में ठंडक बनी रहे। शुक्रवार को जुड़ शीतल पर्व मनाया जाएगा। बता दें कि मिथिला नगरी में इस पर्व का खास महत्व है। खासकर अभी भी जुड़-शीतल में लोक परंपरा अभी भी जीवंत हैं। जुड़-शीतल पर्व वैशाख के आरंभ में होता है, और इसी दिन मिथिलांचल में नववर्ष माना जाता है। दो दिन तक चलने वाले इस त्योहार को मिथिलांचल के घर-घर में मनाया जाता है। जहां पहले दिन लोग इसमें दाल पूड़ी, सहजन की सब्जी, चावल-कढ़ी बड़ी, कच्चे आम की चटनी और पकौड़े बनाते हैं।

जुड़-शीतल में जुड़ शब्द यानि कि जुड़ाव से बना है, साथ ही इसका मतलब फलने-फूलने से भी हैं। इसमें रबी की नई फसल गेहूं-चना की कटाई से भी जुड़ा हुआ है। आम के फसल बड़े होने लगते हैं। पूड़ी चने की दाल और गेहूं के आटे से बनती है। इसलिए इस दिन देवी-देवता की पूजा करने के बाद बाह्मण भोज कराने का भी रिवाज है। तथा अनाज-फल और सब्जी दान भी करने की परंपरा है। जुड़-शीतल पर्व के दूसरे दिन सबसे पहले घर के बड़े बुजुर्ग बच्चों के सर पर ठंडा पानी यानि बासी पानी डालते हैं। इसका मतलब यह है कि आपका जीवन शीतल रहें।

इसके बाद घर के देवी-देवता की पूजा की जाती है। तुलसी में घड़ा बांधा जाता है, और उसके पेंदी में एक छेद कर कुश फंसा दिया जाता है। जिससे बूंद-बूंद पानी तुलसी में पूरे वैशाख में गिरते रहे। साथ ही लोग बगीचे-फुलवारी के हर पेड़-पौधों में पानी डालते हैं। बता दें कि इस दिन लोग एक-दूसरे पर कीचड़ भी फेंकते हैं, जिसका मतलब होता है कि शरीर ठंडा रहे। यह आपसी प्रेम का भी प्रतीक हैं।

जुड़-शीतल पावन के दूसरे दिन खाना बनाने का रिवाज नहीं है। इसमें पहले दिन का खाना ही दूसरे दिन बासी खाया जाता है। लेकिन बदलते युग के अनुसार अब बासी खाना खाने का रिवाज नहीं रहा। लेकिन लोग शगुन के तौर पर थोड़ा सा भी जरूर खाते हैं। खाने में हर से जुड़े हर चीज को नैवेद्य लगाते हैं। साथ ही चूल्हा, चौखट, दरवाजा, खिड़की, आंगन हर जगह खाने का भोग लगाया जाता है। लोगों का मानना है कि बासी खाना खाने से साल भर पित्त की बीमारी नहीं होती है।

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