खोज करे
  • DARBHANGA CITY

जितिया पर्व का निर्जला उपवास आज से शुरू, जाने जिउतिया व्रत का महत्व?


हर वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित्पुत्रिका व्रत रखने का विधान है। जिसे जितिया या जिऊतिया व्रत भी कहते हैं। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्व-

संतान की खुशहाली को लेकर रखें जाने वाले व्रत जितिया में नहाय-खाय से ही नियम का पालन शुरू कर दिया जाता है। बता दें कि इस व्रत को शुरू करने से पहले भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में खान-पान अपनी क्षेत्रीय परंपरा है। जिसके सेवन से व्रत शुभ और सफल होता है। वहीं इसकी पूजा झिंगुनी के पत्तों पर होती है


व्रत से पहले ऐसा होता है खान-पान



बता दें कि हिंदू धर्म में मांसाहार का सेवन पूजा-पाठ में वर्जित माना गया है। लेकिन इस व्रत की शुरुआत मछली खाकर भी की जाती है। इसके पीछे कुछ पौराणिक मान्यताएं कहीं गयी हैं, जहां इस परंपरा के पीछे जितिया व्रत की कथा में चील और सियार की कथा होना बताया गया है। व्रत रखने से पहले नहाय-खाय के दिन महिलाएं गेहूं के रोटी खाने की बजाय मरूआ के आटे की रोटियां खाती है। मरूआ के आटे की रोटी के साथ मिथिला में मछली खाने की भी परंपरा है। वहीं शाकाहारी महिलाएं इस व्रत में झिंगनी खाती है। साथ ही नोनी का साग भी खाने का रिवाज है। नोनी के साग में कैल्शियम और आयरन भरपूर मात्रा में पाई जाती है। इसे व्रत से पहले ख़ाने से पाचन क्रिया सही रहता है।



सरसो तेल और खड़ी चढ़ाई जाती जीमूतवाहन भगवान को



जितिया निर्जला व्रत हैं, वहीं इस बार महिलाएं 37 घंटे उपवास में रहने के बाद अन्न-जल ग्रहण करेंगी। व्रत को सफलतापूर्वक करने के बाद महिलाएं जितिया का लाल धागा गले में पहनती हैं तथा जितिया का लॉकेट भी धारण करती है। जीमूतवाहन भगवान की पूजा में सरसों तेल और इसकी खड़ी चढ़ाई जाती है। व्रत पूरा होने के बाद यह तेल बच्चों के सिर पर आशीर्वाद के तौर पर लगाया जाता है।

628 व्यूज0 टिप्पणियाँ

हाल ही के पोस्ट्स

सभी देखें