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मिथिला का बाबाधाम कुशेश्वरधाम, जाने सावन में क्यों बढ़ जाता है महत्व?


मिथिला सदियों से शिव भक्ति का प्रमुख केन्द्र रहा है। जिसमें कुशेश्वरस्थान का इतिहास बहुत पुराना हैं, इसका ज़िक्र पुराणों तक में मिलता है। साथ ही कुशेश्वरस्थान को भगवान राम के पुत्र कुश से जोड़ कर देखते हैं। वहीं लोगों की माने तो इसका निर्माण राजा कुशध्वज ने कराया था। बाबा कुशेश्वरस्थान मंदिर की बात करें तो कहा जाता है कि हजारों साल पहले यहां कुश का घना जंगल था। मंदिर के पास के गांव के खागा हज़ारी नामक चरवाहे ने देखा कि एक स्थान पर बहुत से दुधारू गाय अपनी दूध गिरा रही है। यह बात उसने लोगों को जाकर बताई, जिसके बाद लोग उस जगह पर पहुँचे। गाँव के लोग ने जिस जगह पर दूध गिर रहा था, उस जगह की खुदाई की करायीं। खुदाई में एक शिव लिंग निकला और तब से वहां पर भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाने लगी। इन्हें अंकुरित महादेव भी कहा जाता है, यहाँ बाबा कुशेश्वरनाथ सबकी मनोकामना पूरी करते हैं।


कुशेश्वर नाथ की महिमा निराली



कुशेश्वरस्थान दरभंगा जिला मुख्यालय से 70 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है। जहां तीन नदियों के मुहाने पर प्रकृति के बीच कुशेश्वरस्थान भोलेनाथ का मंदिर अवस्थित है। यहां आने पर भक्तों को परम अनुभूति मिलती है। यही नहीं कुशेश्वरस्थान की महिमा इतनी निराली है जहां पूरे मिथिलांचल के साथ नेपाल के पड़ोसी जिला, पश्चिम बंगाल और झारखंड से भी भक्तों का साल भर आना-जाना लगा रहता है। पर श्रावण मास में इस मंदिर की बात ही अलग होती है। सावन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आकर बाबा कुशेश्वर नाथ को जलाभिषेक करते हैं तथा पूजा-अर्चना कर बाबा कुशेश्वर नाथ से आशीर्वाद लेते हैं।


लगातार दूसरे साल भी जलाभिषेक की अनुमति नहीं



कुशेश्वरस्थान में भगवान भोलेनाथ की दर्शन करने के लिए सावन में सबसे अधिक भक्त आते हैं। लेकिन कोरोना संक्रमण को लेकर दूसरे साल भी शिवालय भक्तों के लिए नहीं खुलेंगे। आज सावन की पहली सोमवारी हैं, लेकिन कोरोना गाइडलाइन के तहत मंदिर परिसरों में विशेष सावधानियां बरतने का निर्देश प्रशासन द्वारा दिया गया है। भक्तगण को जलाभिषेक की अनुमति नहीं मिलने के कारण इस बार भी मंदिर सूना रहेगा।


पक्षी अभयारण्य के तौर पर मशहूर, रेलवे से भी जोड़ने की तैयारी



कुशेश्वरस्थान की बात करें तो यह भारत का एक प्रमुख पक्षी अभयारण्य के तौर पर जाना जाता है, जो करीब 14 हजार हेक्टेयर में फैला हुआ है। यहां पर स्थित चौर में कड़ाके की ठण्ड में बड़ी संख्या में दुर्लभ प्रजाति की पक्षीयां तीन माह तक प्रवास करते हैं। इसके अलावा हसनपुर-खगड़िया-सकरी रेल लाइन से इसे जोड़ा जा रहा है, वहीं DARBHANGA और SAHARSA से जोड़ कर इसको जंक्शन बनाने की भी योजना है। जल्द ही दरभंगा से खगड़िया तक कुशेश्वरस्थान हो कर नेशनल हाइवे का भी निर्माण होना हैं, जो दोनों ज़िलों कि दूरी 50 किलोमीटर कम कर देगी।

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