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रून्नीसैदपुर के फेमस बालूशाही को मिलेगी जीआइ टैग, कवायद तेज।



रून्नीसैदपुर (सीतामढ़ी) की पारंपरिक मिठाई बालूशाही की मिठास अब विदेशों तक भी पहुंचेगी। जी हां, हम आपको बता दें कि "बालूशाही" को वैश्विक पहचान मिलने की उम्मीद तेज हो गई है। जल्द ही बालूशाही को जीआइ टैग के दायरे में लाया जा सकता है। इसको लेकर पटना में नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) की हुई बैठक में बालूशाही को जीआइ टैग दिलाने की सहमति बनी। नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक के कथन अनुसार बिहार में कई विशेष उत्पाद हैं जिसकी देश और विदेश में भारी मांग है। परन्तु असंगठित क्षेत्र के जरिए उत्पादन होने से इसे जीआई टैग दिलाने के बारे में कभी सोचा नहीं गया।


बालूशाही के बिना सीतामढ़ी की यात्रा अधूरी



बिहारी व्यंजनों में अपनी विशिष्टता के लिए मशहूर रून्नीसैदपुर की लजीज मिठाई "बालूशाही" के बिना सीतामढ़ी की यात्रा अधूरी है। अगर आप सीतामढ़ी गये और रून्नीसैदपुर की बालूशाही नहीं खाई तो समझिए आपकी यात्रा निरर्थक है। रून्नीसैदपुर की विशिष्टता को दर्शाने में बालूशाही की अहम भूमिका हैं। छेना के साथ सुजी की एक खास मात्रा के साथ चीनी की चाशनी में बनाई जाने वाली इस मिठाई की खासियत यह है कि बिना फ्रीज में रखे भी एक सप्ताह तक खराब नहीं होती। मालूम हो कि रून्नीसैदपुर के बालूशाही की एक अलग पहचान एवं ख्याति हैं, जिसका नाम सुनते ही मुंह में पान भर आता है। रून्नीसैदपुर एवं भुतही का बालूशाही की अपनी अलग ही पहचान है।


जीआई टैग मिलने के बाद बढ़ेगी विशिष्टता



बताते चलें कि बालूशाही इतना फेमस है कि राज्य या बाहर से आने-जाने वाले लोग तोहफे के तौर पर इसे ले जाना नहीं भूलते। बालूशाही की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इतनी सस्ती, टिकाऊ और लजीज मिठाई पूरे बिहार में ही शायद कही मिले। रून्नीसैदपुर की बालूशाही को जीआइ टैग मिल जाने से इसकी मिठास देश भर के साथ विदेशों में भी पहुंचेगी। वहीं इलाका अपनी राष्ट्रीय पहचान के साथ विकास के पथ पर भी अग्रसर हो सकता है। बालूशाही मिठाई का इतिहास 100 साल से ऊपर का हैं। जीआई टैग मिलने के बाद इस क्षेत्र की विशिष्टता को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगी।

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